Sunday, July 24, 2016

(Part 7) पंछी ऐसे आते हैं....(Some More Stories of Migration of Birds)

खीचन  में कुरजा पक्षियों का समूह 

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की यह सातवीं कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!

जितेन्द्र भाटिया
पंछी ऐसे आते हैं....... पंछी ऐसे जाते हैं...... 

यह तो हम तुम्हें बता ही चुके हैं कि भोजन और प्रजनन के लिए बहुत सारे पक्षी हर साल लम्बी यात्राएं करते हैं. लेकिन लम्बी दूरियों तक का प्रवास करने वाले कुछ पक्षियों के कारनामे सुनकर तुम आश्चर्य में पड़ जाओगे !


राजस्थान में जोधपुर से कुछ दूरी पर फलौदी शहर के पास एक छोटा सा गांव  है खीचन, जो तपती गर्मियों में लगभग उजाड़ हो जाता है. लेकिन बरसातों के बाद सितम्बर का अंत होते-होते यहाँ हज़ारों की संख्या में सुदूर मंगोलिया से कुरजाएं (demoiselle cranes) उड़कर आनी शुरू हो जाती हैं.


उड़कर आती कुरजाएं (demoiselle  cranes)(Grus virgo)   


फिर ये लगभग छह महीनों तक यहीं रहती हैं और गाँव वाले बहुत प्यार के साथ इन सारे पक्षियों के लिए भोजन का इंतज़ाम करते हैं. हर शाम लगभग एक टन ज्वार चुग्गाघर के मैदान में इन पक्षियों के लिए फैलाया जाता है. 


सुबह के समय चुग्गाघर में कुरजाएं 

,दुनिया भर से यहां सैलानी इन सुन्दर पक्षियों को देखने के लिए आते हैं, जिनकी संख्या सितम्बर के अंत तक दस हज़ार से भी अधिक हो जाती है.  गाँव वाले बहुत जतन से छह महीनों तक इन पक्षियों की देखभाल करते हैं. फिर मार्च के अंत तक ये पक्षी फिर से उड़कर अपने सुदूर देश मंगोलिया में लौट जाते हैं. 

खीचन में उड़कर आती कुरजाएं 

मज़े की बात यह है कि कुरजा पक्षी अपने अंडे और बच्चे  सुदूर देश मंगोलिया में ही देता है. 

तुम पूछ सकते हो कि इतने सफर में भी ये पक्षी कभी भटकते नहीं? इतनी दूर से वे नियत समय पर हर साल गाँव कैसे पहुँच जाते हैं?  और यह लंबा सफर वे एक बार में ही पूरा करते हैं या रास्ते में कहीं रुकते भी हैं? और इस यात्रा में क्या बच्चे भी उनके साथ होते हैं? रास्ते में इन्हें भोजन कैसे मिलता है? और रास्ते में क्या इन्हें खतरों का भी सामना करना पड़ता है? पक्षियों के लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़े ये सवाल हमें ही नहीं, दुनिया भर के वैज्ञानिकों को भी अचम्भे में डालते रहे हैं. और इनमें से कुछ के जवाब तो उन्हें पक्के तौर पर आज भी मालूम नहीं हैं.

छोटे पक्षी के पैर  में छल्ला लगाता वैज्ञानिक (चित्र  सौजन्य Julio Reis)  


यूं तो पक्षियों के इस प्रवास या पव्रजन (migration) की जानकारी  मनुष्य को बहुत पहले से है.  लेकिन उड़ने के बाद पक्षी किस रास्ते से कहाँ जाते हैं, यह पता लगाना मुश्किल था. फिर कुछ  वैज्ञानिकों ने पहचान के लिए पक्षियों के पैरों में छल्ला बांधकर उनकी पहचान करने और उनकी यात्राओं के रास्तों के बारे में पता लगाने की कोशिश की. आधुनिक समय में उपग्रह या satellite के ज़रिये पक्षियों के आकाश पथों का पता लगाना बहुत आसान हो गया है. जैसे अब पता चला है कि कुरजाएं पूर्व से ही नहीं, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते भी हमारे देश में आती हैं. बाज़ (falcon ) जाति के कई पक्षी मंगोलिया/ चीन से थाईलैंड और फिर हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों (नगालैंड, असम) से होते हुए हमारे देश से गुज़रकर आगे अफ्रीका चले जाते हैं. कई उकाब सीधे हिमालय पार कर भी हमारे देश में आते हैं. 

लालसिर बत्तख का जोड़ा  red crested pochard (Netta rufina)- यह दक्षिण योरोप से पाकिस्तान के रास्ते सर्दियाँ बिताने हमारे यहां आती है. यह चित्र दार्जीलिंग के पास की एक झील का है.  


पव्रजन के दौरान पक्षी अलग अलग ऊंचाइयों पर उड़कर अपना सफर तय करते हैं. एवेरेस्ट के एक अभियान में चोटी पर छोटे गुदेरे (Bar Tailed Godwit) और सींखपर बत्तख (Northern Pintail) की अस्थियाँ मिली, यानी ये पक्षी वहां 5000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे थे.  

सींखपर बत्तख (Anas acuta) का जोड़ा दक्षिणी भारत में   


सरपट्टी सवन (Bar Headed Goose) हिमालय पार करते समय इससे भी अधिक 6500 मीटर  की  ऊंचाई पर उड़ती है. लेकिन अधिकाँश पक्षी प्रवास की यात्राओं में काफी नीचे 150 से 500 मीटर तक की ऊंचाइयों पर उड़ान भरते हैं. बाज़ और उक़ाब अक्सर अपने काफिलों में गोल गोल उड़ते हुए आगे बढ़ते हैं. अपनी यात्रा को आसान बनाने के लिए पक्षी अक्सर पहाड़ों के बीच, नदियों के ऊपर से या समुद्रतट के किनारे आकाश मार्ग बनाते हैं ताकि उन्हें अनुकूल हवा से मदद मिल सके.

पव्रजन यात्रा करने वाले अधिकाँश पक्षी एक ही आकाश मार्ग का इस्तेमाल करते हैं जहाँ एक के बाद एक, अलग अलग पक्षियों के काफिले आकाश से गुज़रते हैं. 

प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ जॉर्ज मोंटागु के नाम से जाने वाला मोंटागु गिरगिटमार  Montagu Harrier (Circus pygargus)  योरोप से आकर यहां सर्दियां बिताता है 

इस नज़ारे को देखने के लिए वैज्ञानिक और पक्षी प्रेमी अक्सर अपनी दूरबीनें और कैमरे लेकर पहुँचते हैं. 

रैप्टर हिल थाईलैंड में उकाब की प्रतिमा 


तुर्की के पास बोस्फोरस की खाड़ी, स्वीडन के दक्षिण में स्थित फॉलस्टर्बो और थाईलैंड में रैप्टर हिल ऐसे ही कुछ जाने-माने स्थल हैं जहां से हर साल लाखों की संख्या में पक्षी आकाश के रास्ते गुज़रते हैं. अक्सर यहां वैज्ञानिक पहचान के लिए कुछ पक्षियों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक छल्ले बांधकर इन्हें फिर से आकाश में छोड़ देते हैं ताकि इंसान को पक्षियों की इन हवाई यात्राओं को समझने में मदद मिल सके.

तुमने कई बार देखा होगा कि हवा में उड़ते पक्षियों के समूह कई बार अंग्रेजी के V अक्षर बनाकर उड़ते नज़र आते हैं. ऐसा वे हवा को काटकर ऊर्जा बचाने के लिए करते हैं. वैज्ञानिकों ने पाया है कि V के आकार में उड़ती बत्तखें किसी अकेली बत्तख के मुकाबले दस से बीस प्रतिशत ऊर्जा बचाकर लगभग 5 किलोमीटर प्रति घंटा अधिक तेज़ उड़ पाती है. 

सर्दियों में तालाबों/नदियों पर अक्सर दिखाई देने वाला जीरा बाटन little ring plover (Charadrius dubius) जिसकी आँखों का पीला घेरा प्रजननशील नर की निशानी है. यह अपना घोंसला योरोप में बनता है 

प्रजनन के बाद जब बच्चे बड़े होकर पूरी तरह उड़ान भरने लगते हैं तो इन्हें भी इन लम्बी यात्राओं में शामिल कर लिया जाता है. लेकिन देखा गया है कि उड़ते पक्षियों के अधिकाँश समूहों में बच्चे सबसे आगे उड़ते हैं, ताकि वे लगातार बड़ों की निगाहों में बने रहें! 

आकाशमार्ग का यह लंबा सफर कुछ पक्षी तो एक बार में ही पूरा कर लेते हैं तो कुछ रुक रूक कर कई दिनों या कुछ सप्ताहों में  यह रास्ता तय करते हैं. 

बिना रुके एक बार में सबसे लंबी उड़ान भरने का विश्व रिकॉर्ड छोटे गुदरा के नाम है. यह पक्षी अलास्का से उड़कर न्यूज़ीलैंड के अपने प्रजनन स्थलों तक का 11000 किलोमीटर का सफर एक बार में पूरा कर डालता है. कहा जाता है कि इस लम्बी उड़ान के दौरान उसके शरीर का वजन आधे से भी काम रह जाता है.

दुनिया के सबसे लम्बे उड़ाकू पक्षी का बड़ा भाई बड़ा गुदेरा black tailed godwit (Limosa limosa)    

 इससे भी आश्चर्य उड़ान आर्कटिक कुकरी (arctic  tern) की है जो आर्कटिक के अपने प्रजनन स्थलों से पृथ्वी  के दूसरे छोर अंटार्कटिका तक का लम्बा सफर हर साल तय करती है. कुछ वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में पहचान के लिए  कुछ कुकरियों के पैरों में छल्ले बांधे और फिर दो तीन दिन हवाई जहाज़ों में बैठकर आर्कटिक आए. उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने पाया कि  वे पक्षी उनसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे!

लेकिन कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अधिकाँश पक्षी  सीधे सफर करने की जगह बीच बीच में रूककर विश्राम करते और भोजन तलाशते हैं. कई बार यह विश्राम उनके लिए खतरे का कारण भी बन जाता है. पव्रजन के दौरान पक्षियों पर आने वाली विपदाओं  की कुछ और कहानियां अगली बार!

***

© all rights reserved 

Wednesday, June 1, 2016

(भाग 6) चल उड़ जा रे पंछी! (Migration of Birds)


बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की ताज़ा कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!


जितेन्द्र भाटिया

चल उड़ जा रे पंछी!


गर्मियों के दिन फिर से आ गए हैं! क्या तुमने सोचा है कि सर्दियों में हर जगह दिखाई देने वाले कुछ परिचित पक्षी गर्मियां आते ही कहाँ गुम हो जाते हैं? गुलाबी मैना (rosy starling)-- जिसके बड़े-बड़े झुण्ड दिसम्बर जनवरी में तारों और पेड़ों पर दिखाई देते हैं. 

गुलाबी मैनाओं (rosy starlings) का झुण्ड, उड़ने की तैयारी में 

लेकिन मार्च के आते आते ये पक्षी किसी लम्बी यात्रा की तैयारी में दिखाई देते हैं. पूंछ थिरकने वाला 'थिरथिरा' (black redstart), तालाब के सुदूर कोने में तैरती छोटी मुर्गाबियाँ (common teal) और हवा में उड़ते देसी चित्रा उकाब (Indian spotted  eagle), ये सब हमारे मैदानी इलाकों में सिर्फ सर्दियों में ही दिखाई देते हैं. 

सर्दियों में तालाबों की मेहमान छोटी मुर्गाबियां (common teal)

यह तो तुम जान ही चुके हो कि  पक्षियों के जीवन की दो सबसे ज़रूरी क्रियाएँ  हैं  भोजन और प्रजनन. इन दोनों के बगैर पक्षी न ज़िंदा रह सकते हैं और न ही अपना वंश बढ़ा सकते हैं. इन्हीं दोनों क्रियाओं को पूरा करने के लिए ये हर साल उड़कर लम्बी यात्राएं करते हैं. ठन्डे प्रदेशों में जब सर्दी, पाला और बर्फ गिरती है तो वहाँ भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में पक्षी उड़कर हमारे कम ठन्डे मैदानी प्रदेशों में आ जाते हैं जहां इन्हें पर्याप्त भोजन आसानी से मिल जाता है. फिर मार्च के बाद जब हमारे मैदानों में गर्मी बढ़ने लगती है तो ये पक्षी अपने ठन्डे देशों में लौट जाते हैं, घोंसले बनाने, अंडे देने और अपने बच्चों को बड़ा करने के लिए. 

परिचित प्रवासी पक्षी छोटा जुमिज उकाब (Tawny  Eagle) 

तुममें से कई लोग गर्मियों के महीने में छुट्टियां मनाने पहाड़ों में चले जाते हो न? कुछ इसी तरह कई पक्षी गर्मियों में उत्तर के ठन्डे प्रदेशों का रुख करते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि पक्षियों की ये यात्राएं छुट्टी के लिए नहीं, बल्कि भोजन ढूँढ़ने और घोंसले बनाने की जिम्मेदारियां निभाने के लिए होती हैं. 

वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया में पक्षियों की नौ हज़ार से अधिक प्रजातियों में से लगभग 40 प्रतिशत यानी कोई साढ़े तीन हज़ार प्रजातियां हर साल एक जगह से दूसरी जगह जाने और फिर लौटकर आने का प्रवास या प्रव्रजन (migration) करती हैं. पक्षियों की ये हर साल की दोहरी यात्राएं कई हज़ारों सालों से चली आ रही हैं और ग्रीक के कई पुराने ग्रंथों और बाइबिल तक में इनका ज़िक्र मिलता है. प्रव्रजन कभी एक-तरफ़ा नहीं होता. यानी मौसम बदलने के बाद पक्षी फिर से अपनी वापसी यात्रा पर निकल पड़ते नहीं और यह चक्र साल-दर-साल चलता रहता है. 

हिमालय और उसके पार से सर्दियों में आने वाली सरपट्टी सवन ( Bar Headed Geese)

पक्षियों के प्रव्रजन में सबसे अचम्भे भरा है उनका लम्बी दूरी का प्रवास (long  distance migration) जिसमें ये सर्दियों के बढ़ते ही अपने ठन्डे प्रदेशों को छोड़कर हज़ारों मील दूर हमारे जैसे गर्म देशों की ओर झुण्ड बनाकर उड़े चले आते हैं--ठन्ड से बचने और अनुकूल भोजन की तलाश में. उत्तर भारत के पोखरों, तालाबों और प्राकृतिक जलाशयों में हर साल सर्दियों में कई तरह की बत्तखें--सिलेटी सवन (greylag geese), सरपट्टी सवन (bar-headed geese), सुर्खाब (ruddy shelduck), छोटी मुर्गाबी, चेता, सींखपर, तिदारि (common teal, gargany, northern pintail, northern shoveler) आदि हज़ारों की संख्या में सुदूर ठन्डे प्रदेशों से उड़कर आती हैं. राजस्थान एवं कई अन्य प्रांतों मे कुरजाएं (demoiselle cranes)सितम्बर-अक्टूबर में मंगोलिया और पूर्वी यूरोप से आती हैं और लगभग छह महीने यहाँ गुज़ारकर मार्च के अंत में वापस अपने ठन्डे प्रदेशों में लौट जाती हैं. 

खीचन राजस्थान में मंगोलिया  से हर साल आने वाली कुरजाएं  (Demoiselle Cranes)

पानी के पक्षियों की ही तरह मैदानों और वनों, बगीचों में लहटोरे (shrikes), उकाब (eagles), पत्तई/ गिरगिटमार (harriers), भुपिद्दा (wheatears), मैनाएं (starlings) और कई दूसरे पक्षी इसी तरह लम्बी यात्राओं के बाद हमारे यहां सर्दियां गुज़ारने के लिए आते हैं.       

लंब पूंछ लहटोरा (Long Tailed Shrike)

पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्द्ध  में चूँकि मौसम उलट होता है इसलिए वहां पक्षी सर्दियों में उत्तर की ओर यात्रा करते हैं और गर्मियों में दक्षिण में वापस आ जाते हैं. 

इतनी लम्बी उड़ानें भरकर ये पक्षी बिना भटके अपने चुने हुए स्थान पर कैसे पहुँचते हैं इसे हमारा विज्ञान आज भी पूरी तरह समझ नहीं पाया है. इसपर फिर कभी विस्तार से बात करेंगे.  

सभी पक्षी इतनी लम्बी यात्राएं करते हों, ऐसा नहीं है.  कुछ पक्षी गर्मियों में सिर्फ छोटी दूरी का प्रवास (short  distance migration) करते हैं. जैसे हमारी स्थानीय गुगरल और सिल्ही बत्तखें (spot billed and lesser whistling ducks) पानी और भोजन की तलाश में आस पास के पानी के क्षेत्रों में चली जाती हैं.

स्थानीय पक्षी गुगरल बत्तख (Spot Billed Ducks)

 पहाड़ी क्षेत्रों के पक्षियों में इससे मिलता-जुलता एक और प्रवास होता है.  भूटान में 5000 मीटर की ऊंचाइयों पर तीतर प्रजाति का एक पक्षी रक्तिम फेजेंट (blood  pheasant) पाया जाता है जो अत्यधिक सर्दी पड़ने पर 3000 मीटर तक नीचे उतर आता है और मौसम बदलने पर फिर वापस ऊपर चला जाता है. हिमालय की ठंडी आबोहवा में रहने वाले मनुष्यों की तरह वहाँ के कई दूसरे पक्षी भी यही करते हैं. पक्षियों के ठण्ड से जुड़े ऊंचाइयों के इस प्रवास को  हम altitudinal migration कहते हैं.

पहाड़ों में रहने वाला रक्तिम फेजेंट (Blood Pheasant)

पक्षियों के पंख उनके सबसे ज़रूरी अंग होते हैं. सभी पक्षियों के पंख हर साल झरते हैं और उनके स्थान पर नए पंख उग आते हैं. पंखों की इस प्रक्रिया को अंग्रेजी में moulting कहते हैं. शाही चकवा (common shelduck) जैसे कुछ पक्षी पंख झरने के बाद इस कदर नंगे और पंख विहीन हो जाते हैं कि  नए पंख आने तक उनके लिए उड़ना संभव नहीं होता. ऐसे पक्षी पंखों के झरने से पहले किसी सुरक्षित निर्जन स्थल पर चले जाते हैं जहाँ नए पंखों के आने तक वे  बाहरी खतरों से बचे रह सकें. तो यह पक्षियों का एक और तरह का प्रवास हुआ जिसे moulting migration का नाम दिया जाता है. 

शाह चकवा (Common  Shelduck) जो पंखों के झरते समय एक निर्जन द्वीप में चला जाता है  

लेकिन साल में दो बार यात्राएं करने वाले इन पक्षियों के अलावा बहुत से पक्षी ऐसे भी हैं जो अपना सारा समय एक ही स्थान पर बिताते हैं. इन्हें तुम स्थानीय पक्षी या resident birds  कहा जा सकता है. 

और इन सब पक्षियों के अलावा कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी यात्राओं के दौरान कुछ समय के लिए बीच के स्थलों पर रुकते हैं, जैसे  दिल्ली से चेन्नई और वहां से वापस आने वाली रेलगाड़ी बीच में नागपुर स्टेशन पर रूकती है. 

योरोपियन नीलकंठ (European Roller) जो योरोप से अफ्रीका की यात्रा के बीच सितम्बर में राजस्थान से गुज़रता है 

देसी नीलकंठ पक्षी (Indian  roller) से मिलता-जुलता एक विलायती  नीलकंठ (European Roller) भी होता है जो सर्दियों में यूरोप से लम्बी प्रवास यात्रा पर अफ्रीका की ओर निकलता है. लेकिन वहाँ सीधे जाने की जगह यह हवाओं के अनुकूल पूर्वी भारत के राजस्थान से होता हुआ फिर समुद्र के रास्ते अफ्रीका का  रुख करता है. तो इस तरह सर्दियों से पहले सितम्बर में यह राजस्थान पहुँचता है और वापसी यात्रा पर फेब्रुअरी के आसपास इसे फिर से यहाँ देखा जा सकता है. इस तरह भारत के लिए यह पक्षी मुसाफिर प्रवासी या passage  migrant हुआ. ऐसे ही कुछ और पक्षी भी हैं जो अपनी यात्राओं में भारत से होकर गुज़रते हैं.


तो यह हुई पक्षियों की लम्बी और छोटी यात्राओं  की अलग अलग किस्में!  इन यात्राओं से जुड़ी  कुछ और दिलचस्प कहानियां अभी बाकी हैं!  
   
***
© all rights reserved 


Sunday, January 17, 2016

(भाग5) पंखों की कहानी -- यानी अंडे का 'फंडा'!

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की ताज़ा कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!

जितेन्द्र भाटिया
पंखों की कहानी -- यानी अंडे का 'फंडा'!
बच्चों और बड़ों की एक लोकप्रिय अनबूझ पहेली है कि 'पहले मुर्गी आयी या अंडा?' और इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह हो सकता है कि इन दोनों के आने से पहले इस दुनिया में क्या था?

हमारे लक्कड़ दादा लंगूर महाशय!

वैज्ञानिक डार्विन का मानना है कि इस दुनिया में हर जीवित जीव अपने पहले के किसी जीव से विकसित होकर धरती पर आया है. जीवों के इस विकास में लाखों वर्ष लग गए. डार्विन के इसी सिद्धांत से बंदरों को मनुष्य का पूर्वज माना गया है. माना जाता है कि पक्षियों का जन्म और उनका विकास भी इसी तरह पूर्व प्रजाति के किसी पक्षी से हुआ है. पत्थरों में दबे जीवाश्मों (fossils) से इस बात के कई प्रमाण मिलते हैं. कभी कभी धरती से मिलने वाली हड्डियों से भी इन प्राग् ऐतिहासिक प्रजातियों का पता चलता है. इन जीवाश्मों और हड्डियों की मदद से वैज्ञानिक प्रजातियों की उम्र और इनके जीवनकाल का अंदाजा लगाते हैं. 

कहा जाता है कि दुनिया के पहले दैत्याकार जीव डायनासोर (dinosaur) आज से कोई 2000 लाख वर्ष पहले जुरासिक युग में धरती पर आये. इन्हीं में से एक मांस भक्षी छोटे आकार की डायनासोर प्रजाति 'थेरोपोड' का विकास आज से 1500 लाख साल पहले हुआ. माना जाता है कि इसी 'थेरोपोड' से आगे चलकर धीरे-धीरे कई लाखों वर्षों में पक्षियों ने अपना रूप लिया.  

म्यूजियम में थेरोपोड डायनासोर का कंकाल 

दिलचस्प बात यह है कि जुरासिक युग के इन डायनासोर जीवों में थेरोपोड के अलावा किसी भी डायनासोर की अगली पीढ़ियां अब दुनिया में बाकी नहीं हैं! बाकी डायनासोर जीवों की तरह थेरोपोड के भी दाँत थे. लेकिन हज़ारों सालों के विकास के बाद पक्षियों के दाँत जाते रहे और इनके स्थान पर चोंच विकसित हुई जो पक्षियों को अपना भोजन ढूंढने और पकड़ने में सहायता देती है. ज़मीन हो या पानी, रेत हो या दलदल, अपनी अलग आकार की चोंचों  से पक्षी हर जगह अपना भोजन ढूंढ ही लेते हैं. 

पोखर में चोंच से कीड़े पकड़ता छोटा गुदरा  Bar Tailed Godwit (Limosa lapponica) 

चोंच के अलावा भी पक्षियों में कई गुण मिलते है, जो एक तरह से उनकी पहचान हैं! दो टांगें, गर्म खून, रीढ़ की हड्डी, प्रजनन के लिए अंडे देना और इन सबसे ऊपर- उड़ने के लिए दो आश्चर्यजनक जादुई पंख! छोटे नन्हे शक्करखोरे से लेकर विशालकाय शुतुरमुर्ग, सबमें तुम्हें यह पहचान मिलेगी. वैज्ञानिक शब्दावली में सभी पक्षियों को एक नाम दिया गया है-- एवीएल aviale. इस अंग्रेज़ी नाम का सम्बन्ध उड़ने से है. लेकिन सभी पक्षी उड़ते हों, ऐसा नहीं है. इनमें अंतर दिखाने के लिए वैज्ञानिकों ने वर्तमान युग में पक्षियों को दो बड़ी जातियों में बांटा है- 'न उड़ने वाले' --neomithes और बाकी के सारे 'उड़ने वाले'-- neognathae. 


कीवी पक्षी (Apteryx )और उसका अंडा  

दुनिया में पक्षियों की कोई पचास ऐसी प्रजातियां हैं जिनके डैने नहीं होते, या फिर होते हैं तो ऐसे जिनसे ये हवा में छलांग तो लगा सकते हैं पर उड़ नहीं सकते. लेकिन इस एक अंतर को छोड़कर उनमें बाकी गुण दूसरे पक्षियों जैसे ही होते हैं. और इसीलिये इन्हें पक्षी ही माना जाता है. न्यूज़ीलैंड में पाया जाने वाला 'कीवी' ऐसा ही एक डैना रहित पक्षी है जिसके अंडे का आकार काफी बड़ा होता है.  

पेंगुइन पक्षी 

अंटार्कटिका के ठन्डे प्रदेश में पाये जाने वाले पेंगुइन पक्षी भी उड़ नहीं सकते. डैने की जगह उनका एक चप्पू नुमा flapper होता है जिसे वे पानी में तैरते समय चप्पू की तरह इस्तेमाल करते हैं. अफ्रीका में पाया जाने वाला शुतुरमुर्ग दुनिया का सबसे बड़ा पक्षी है जिसके पंख उड़ने की जगह बहुत तेज़ दौड़ने के काम आते हैं. कई देशों में शुतुरमुर्ग को भी मुर्गियों की तरह बड़े बड़े बाड़ों में अंडों और मांस के लिए पाला जाता है.    

मादा शुतुरमुर्ग  (Struthio camelus) 

बस इन गिने चुने 'न उड़ने वाले' पक्षियों को छोड़कर बाकी सारे पक्षी अपने पंखों के सहारे उड़ सकते हैं. पक्षियों के ये पंख भी कई आकार के होते हैं. इनके सहारे ये आकाश में अलग अलग ऊंचाइयों पर उड़ते हैं. कुछ पक्षियों के मज़बूत डैने लम्बी उड़ानों के लिए उपयुक्त होते हैं. गिद्ध और उकाब अपने चौड़े आकार के डैनों के सहारे बहुत ऊँचाई पर हवा में तैरते दिखाई देते हैं.  

हवा में उड़ता काला गिद्ध (Cinereous Vulture) (Aegypius monachus)   

इनके विपरीत मोर और तीतर जैसे पक्षी अपना अधिकाँश समय ज़मीन पर गुज़ारते हैं. इनके पंख थोड़े समय के लिए कुछ ऊँचाई तक उड़ तो सकते हैं पर अधिक समय तक नहीं. 

तीतर के इक पीछे तीतर (Grey Francolin) (Francolinus pondicerianus)  

इसके विपरीत अबाबील-पतासी सारा दिन आकाश में उड़ती रहती हैं. इनके हल्के पंख इन्हें हवा में लगातार चक्कर काटने में मदद करते हैं. महासागर के कुछ पक्षी तो लगातार पानी के ऊपर फैले आकाश में ही सारा जीवन गुज़ारते हैं और उनमें से कुछ तो उड़ते-उड़ते ही अपनी नींद भी पूरी कर लेते हैं. इन्हीं जादुई पंखों के सहारे बहुत से पक्षी हर साल दो बार लम्बी उड़ानें भी भरते हैं. पक्षियों की इन लम्बी हवाई यात्राओं की आश्चर्यजनक कहानियाँ हम आगे बताएँगे! 
***
© all rights reserved 






Sunday, November 22, 2015

(भाग 4) नाम में क्या रक्खा है!

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की ताज़ा कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!

जितेन्द्र भाटिया

नाम में क्या रक्खा है?


तुम इस दुनिया में हर चीज़ को नाम से पहचानते हो न! लेकिन कक्षा में अगर एक ही नाम के दो सहपाठी हों तो?  तब कई बार हम पहचान के लिए एक मोहन को ‘मोटू’ और दूसरे को ‘लम्बू मोहन' कहकर पुकारते हैं. यानी उनके नाम से पहले हम एक विशेषण लगा देते हैं ताकि उनकी पहचान आसानी से हो जाए. 

टुइयाँ तोता (Plum Headed Parakeet ) (Pisttacula cyanocephala)  

बोलचाल की भाषा में पक्षियों का नामकरण भी इसी तरह उनके रंग या किसी और पहचान से किया जाता है. लाल सिर वाले तोते को अंग्रेज़ी में 'plum headed parakeet' कहते हैं क्योंकि इसके सिर का रंग लाल बेर या plum से मिलता जुलता होता है. लेकिन हमारे उत्तरी देहातों में इसी तोते को अपनी तीखी 'टिटियाने' वाली आवाज़ के कारण 'टुइयाँ' तोता कहा जाता है. तमिल में इसका नाम 'सेंथलाई किलि' या 'लाल सिर वाला तोता है. 

सर्दियों में हमारे देश में उत्तरी ठन्डे प्रदेशों से कई पक्षी आते हैं. इनमें से एक है काला सिर थिरथिरा या black redstart. यह पक्षी ज़मीन पर चलते चलते बीच बीच में थिरथिराता है और इसीलिये इसे 'थिरथिरा' कहा जाता है.       
    


काला सिर थिरथिरा (Black Redstart )(Phoenicurus orchruros)

लाल भौंह वाली बुलबुल के सिर पर सिपाहीनुमा टोपी बनी होती है--सो इसका नाम हुआ 'सिपाही बुलबुल’ या 'टोपीदार बुलबुल' ! अंग्रेजी में इसका नाम है Red Whiskered Bulbul.  


सिपाही या टोपीदार बुलबुल (Red  Whiskered Bulbul )(Pycnonotus jocusus

लेकिन तुमने देखा कि अलग अलग भाषाओं में तोते की तरह बुलबुल का नामकरण भी हमने अलग अलग गुणों से कर डाला. अंग्रेजी में उसका नाम उसकी लाल भौंह से हुआ तो हिंदी में हमने उसे कभी सिपाही टोपी तो कभी सिर्फ टोपी वाली बुलबुल कहकर पुकारा. तेलुगु भाषा में इसी बुलबुल को 'तुरहा पिगली पित्ता' (या तुर्रे वाली बुलबुल) कहा जाता है. बांग्ला भाषा में  कोई इसे 'सिपाही बुलबुली' कहता है तो कोई इसे तीखे नैन-नक्श के कारण 'चाइना बुलबुली' बुलाता है. यह बुलबुल दुनिया के विस्तृत प्रदेश में पायी जाती है. इनमें न जाने कितनी भाषाएँ होंगी जिनमें इसी बुलबुल के पता नहीं कितने नाम होंगे. तब इन सारे नामों से यह पता कैसे चले कि हम सब उसी टोपीदार बुलबुल की बात कर रहे हैं? 

नामकरण का यह संकट सिर्फ पक्षियों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों, सांपों, कीड़ों, वनस्पतियों और स्वयं वनमानुष और मनुष्य, यानी हर जीवित प्राणी के नामों को लेकर आता है. अलग अलग भाषाओं और प्रदेशों में इनके अलग अलग नाम हैं. तब वैज्ञानिकों को लगा कि सभी जीवित प्राणियों के प्रचलित नामों के समानांतर उनका एक सर्व मान्य वैज्ञानिक नामकरण भी होना चाहिए जिसे सब लोग मानें और जिसमें फेरबदल की कोई गुंजाइश न हो. विभिन्न भाषाओं में जीवों के नामों के साथ यदि उस जीव का विज्ञानिक नाम भी हो तो सब आसानी से जान जाएंगे कि हम किस जीव या पक्षी की बात कर रहे हैं.

सोलहवीं शताब्दी के योरोप में ज्ञान  अध्ययन की प्रमुख भाषा लैटिन थी. इसी में सबसे पहले जीवों और वनस्पतियों के वैज्ञानिक नामकरण की शुरुआत हुई. लेकिन आरम्भ में इसमें कई मतभेद थे. जीवों के लिए लैटिन में पहली सर्व मान्य दो शब्दों वाली binomial नामावली पद्धति विकसित करने का श्रेय स्वीडन के डॉक्टर और वनस्पति शास्त्री कार्ल लिनेयस को जाता है.    

इन्होंने अट्ठारहवीं शताब्दी के मध्य में अपनी पुस्तकों ‘स्पीशीज प्लांटेरम’ और ‘सिस्टमा नेचुरे’ में पहली बार वनस्पतियों और जीवों के लिए दो शब्दों वाली नामावली का इस्तेमाल किया. इसी के आधार पर आगे चलकर ‘प्राणीशास्त्रीय नामकरण की अंतरराष्ट्रीय पद्धति’ (ICZN) बनी जो आज भी पक्षियों सहित सभी प्राणियों के वैज्ञानिक नामकरण का काम कर रही है. परंपरा के अनुसार यह शब्दावली लैटिन भाषा में हैं. इसी के  अंतर्गत मनुष्य जाति को वैज्ञानिक नाम मिला है –Homo sapiens !

जीवों के नामकरण की इस द्वि-शब्दी वैज्ञानिक को समझना बहुत आसान है. इसमें दो शब्द होते हैं. पहला शब्द पक्षी या जीव की विशिष्ट जाति को इंगित करता है और दूसरा उसके किसी ख़ास गुण को या भौगोलिक क्षेत्र को, जहां वह पाया जाता है. कई बार दूसरा शब्द उस जीव को पहली बार ढूंढने वाले व्यक्ति के नाम पर भी आधारित हो सकता है. हमारे देश के विख्यात पक्षीशास्त्री सलीम अली ने केरल में जिस संकटग्रस्त फल-फूल खाने वाले दुर्लभ चमगादड़ को ढूंढ निकाला था, उसका वैज्ञानिक नाम रक्खा गया है Latidens salimalii! इसमें पहला शब्द Latidens चमगादड़ों की जाति को दर्शाता है और दूसरा शब्द सलीम अली के पहले नाम से बना है.         


गुलाबी मैना (Rosy Starling )(Sturnus roseus)

सर्दियों में गुलाबी मैनाएं (Rosy Starlings) हज़ारों  संख्या में योरोप से भारत में आती हैं. इनका नीचे का भाग हल्का गुलाबी होता है. इनका वैज्ञानिक नाम है Sturnus roseus. इस नाम में पहला शब्द मैनाओं की प्रजाति को दर्शाता है और दूसरा शब्द उनके रंग  से जुड़ा है. इसी प्रजाति की एक और मैना--ब्राह्मिणी या काला सिर मैना (Brahminy Starling) हमारे यहां आम पायी जाती है. इसका नाम ब्रह्मणों जैसी सिर की चोटी और इसके निचले चन्दन भभूत जैसे रंग के कारण है.   

ब्रह्मिणी या कालासिर मैना (Brahminy Starling) (Sturnus pagodarum)

तुम देखोगे कि इन दोनों मैनाओं के वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द एक ही है लेकिन दूसरा शब्द अलग है. इस तरह एक ही प्रजाति के दो पक्षियों को अलग अलग पहचानना अासान हो जाता है.

जीवों की इस वैज्ञानिक नामावली को लिखने के कुछ आसान से नियम भी हैं. इनमें  पहले शब्द के पहले अक्षर को 'कैपिटल' में लिखा जाता है और दूसरे शब्द का पहला अक्षर सामान्य छोटे रूप में. साथ ही छपे हुए गद्य के बीच किसी जीव का वैज्ञानिक नाम आने पर उसे तिरछी शैली या italics में लिखना ज़रूरी होता है. ये सारे नियम दुनिया भर में माने जाते हैं इसलिए किसी नाम में संशय की कोई गुंजाइश नहेीं रहती. दुनिया में जब भी किसी नए जीव का पता चलता है तो सबसे पहले ICZN  इसका नाम जारी करती है जो सबको मान्य होता है.   

मिसेज़ गोउल्ड शक्करखोरा (Mrs. Gould Sunbird)(Aethopyga gouldiae)  

दुनिया में शक्करखोरों (sunbirds) की कई प्रजातियां हैं और इनमें एक बेहद सुन्दर प्रजाति है मिसेज़ गोउल्ड शक्करखोरा जो पूर्वी भारत और आसपास के कई देशों में पाया जाता है. काफी समय पहले आयरलैंड के पक्षीशास्त्री निकोलस विगोर्स ने इसे सबसे पहले ढूँढा था और चित्रकार जॉन गोउल्ड ने इनके पहले चित्र बनाये थे (तब कैमरा तो था नहीं!) गोल्ड के आग्रह पर निकोलस विगोर्स ने इसका नाम चित्रकार की पत्नी पर रख दिया था और इस तरह सामान्य और वैज्ञानिक शब्दावली दोनों में ही इसे मिसेज़ गोउल्ड शक्करखोरा नाम से जाना जाता है!

इस कड़ी में सभी चित्रों के शीर्षक के साथ तुम्हें इन पक्षियों के वैज्ञानिक नाम भी मिलेंगे. लैटिन के इन मुश्किल शब्दों को देखकर घबराना नहीं! आने वाली कड़ियों में हम तुम्हें प्रमुख प्रजातियों के बारे में और कई बातें बतायेंगे.  

  
00   
                                                                          © all rights reserved 


Tuesday, August 26, 2014

तीसरी कड़ी : आओ कुछ और पक्षियों को सुनें और पहचानें!

 पक्षियों का अनोखा संसार (3)

आलेख और छायाचित्र : जितेंद्र भाटिया
तीसरी कड़ी : आओ कुछ और पक्षियों को सुनें और पहचानें!

चित्र 1: सुबह के गायन की रियाज़ करती सलेटी दुम फुदकी
कितना अच्छा लगता है जब सुबह पक्षियों की आवाज़ से हमारी नींद खुलती है. पक्षियों की इसी मिली जुली मधुर आवाज़ के लिए हिंदी में सुन्दर शब्द है ‘कलरव’. इसमें एक आवाज़ को दूसरी से पहचानना मुश्किल होता है. लेकिन फिर भी इसका स्वर कानों को भला प्रतीत होता है.
क्या ये पक्षी हमें जगाने के लिए सुबह-सुबह गाते हैं? नहीं, ऐसा नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना  है कि पक्षियों का कलरव या अंग्रेजी में ‘सुबह का कोरस’ गर्मियों और बरसातों के आरम्भ में अधिक सुनाई देता है. यह समय पक्षियों के लिए घोंसले बनाने और उनमें अंडे देने का होता है. पक्षियों का सुबह का स्वर अक्सर अपने क्षेत्र का ऐलान करने या दूसरे पक्षियों को आगाह करने के लिए होता है कि “मैं यहाँ हूँ!”. कुछ उसी तरह जैसे रात का चौकीदार अपने डंडे को ‘ठक-ठक’ बजाता बीच बीच में आवाज़ लगाता चलता  है—‘जागते रहो!’

पक्षियों की यह आवाज़ अपने साथी को आकृष्ट करने के लिए भी हो सकती है. एक प्रयोग से पता चला कि सुबह का उजाला होने पर सबसे पहले ऊंची डालों के पक्षी बोलते हैं और उसके बाद नीचे के पक्षियों की बारी आती है. पौ फटने से पहले के चौथे पहर में तुमने कई बार मोरों के झुण्ड को ‘पियों! पियों!! पियों!!!’ के साथ चिल्लाते सुना होगा. हैं. मोर रात में बड़े बड़े पेड़ों की सबसे ऊंची डालों पर सोते हैं. यानी सुबह के समय पक्षियों के बोलने का  सीधा सम्बन्ध सूरज  की रोशनी से है.

पक्षियों के जीवन की दिनचर्या में दो सबसे महत्वपूर्ण क्रियाएँ हैं—भोजन और प्रजनन. इन दो के इर्दगिर्द ही उनका सारा जीवन निर्भर है. कुछ पक्षी अपने साथी को आकृष्ट करने के लिए आवाज़ के अतिरिक्त शरीर की भंगिमाओं का भी सहारा लेते हैं. मोर के आकर्षक नृत्य से कौन परिचित नहीं है. मोर का यह नृत्य दरअसल मोरनी को रिझाने के लिए होता है.  
 चित्र २: मोरनी को नाचकर रिझाता मोर
                                                    
        
राजस्थान में अजमेर के नज़दीक एक छोटा सा गाँव है सौंखालिया, जहाँ बरसातों के मौसम में विश्व स्तर पर एक दुर्लभ पक्षी ‘lesser florican’ का आगमन होता है. स्थानीय भाषा एवं हिंदी में इसे ‘खड़मोर’ कहते हैं क्योंकि यह मोर की ही जाति का एक पक्षी है. मादा को आकृष्ट करने के लिए नर खड़मोर मूंग के खेतों में ऊंची छलांग लगता है, फिर ‘धम्म’ से गिरकर फसल में छिप जाता है. साथ ही यह मुंह से आवाज़ भी निकलता है. कई बार तो  इन बारम्बार छलांगों से इसके पैर छलनी होकर खून से सन जाते हैं! 
चित्र 3: हवा में छलांग लगाता खडमोर
हमारे आसपास की दुनिया में कुछ पक्षी सिर्फ सुबह के समय बोलते हैं तो कुछ की सुपरिचित आवाज़ सारा दिन सुनाई देती रहती है. अमराइयों में लगातार कूकती कोयल की आवाज़ को सब पहचानते हैं. कोयल गर्मियों और बरसात के आरम्भ में सबसे अधिक कूकती है क्योंकि यह इसका जोड़े बनाने का समय होता है. डाल पर कूकती आवाज़ नर कोयल की होती है. ‘कोयले सी काली कोयल’, हम अक्सर कहते है, लेकिन गौरैया की ही तरह कोयल के नर और मादा देखने में बिलकुल अलग अलग होते हैं. केवल नर काला होता है, जबकि मादा कोयल बिलकुल भिन्न भूरी चितकबरी दिखती है.
चित्र 4: भूरी चितकबरी मादा कोयल
        
कोयल की ही तरह मोर और मोरनी के बीच का अंतर भी तुमने देखा होगा.
  
चित्र 5: मोरनी
  
बरसातों के मौसम में एक और बार बार सुनायी देने वाला पक्षी है पपीहा जिसकी क्रमशः तेज़ होती
जाती ‘पी-कहाँ! पी-कहाँ!! पी-कहाँ!!!’ की टेर सिर पर चढ़कर बोलती है. इसी के कारण अंग्रेजी में इसे ‘brain fever’ यानी ‘दिमागी बुखार’ भी कहते हैं. देखने में यह बाज़ से मिलता जुलता है और इसी लिए इसका दूसरा नाम है ‘common hawk cuckoo’.
चित्र 6: सामान्य पपीहे का बाज़ से मिलता जुलता चेहरा



लेकिन कोयल और पपीहे में एक और दिलचस्प समानता है. ये दोनों स्वयं घोंसला नहीं बनाते, बल्कि चुपके से कौए या छोटी सी फुदकी के घोंसले में अपने अंडे रख देते हैं. कौवा अंडे को अपना ही मानकर उसे सेता है. फिर जब अंडे से बच्चा निकल आता है तो वह उसे भोजन भी लाकर खिलाता है. अपना घोंसला न बनाने वाले इन पक्षियों को अंग्रेजी में  brood parasite या पर-पोषक-जीवी कहा जाता है.





                        चित्र 7: अपने से बड़े कोयल के बच्चे को खाना खिलाती धायी मां फुदकी
बात पक्षियों की बोली की निकली है तो चलते चलते तुम्हें अपने आस पास के एक और सुन्दर पक्षी से मिलवाते चलें. हो सकता है तुमने इसे देखा न हो, लेकिन इसकी आवाज़ तुमने अवश्य सुनी होगी. यह  ‘हुक!’....‘हुक!’....‘हुक!’ की सी एकसार आवाज़ में लम्बे समय तक बोलता चला जाता है. तुम्हें लगेगा जैसे कहीं से किसी ठठेरे के बर्तन पर काम करने की आवाज़ आ रही है! इसीलिये इसका नाम है ‘ठठेरा बसंता’, (अंग्रेजी में coppersmith barbet). इसके माथे पर तुम्हें सुन्दर लाल टीका और चोंच के नीचे पीला गला दिखेगा.
चित्र 8: आवाज़ लगाता ठठेरा या छोटा बसंता

इस टीके के कारण कुछ लोग इसे ‘पंडितजी’ नाम से भी जानते हैं. यह आकर में इतना छोटा होता है कि इसे ठीक से देखने के लिए तुम्हें दूरबीन की ज़रुरत पड़ सकती है. लेकिन अगली बार जब तुम्हें इसकी ‘हुक!’....‘हुक!’....‘हुक!’ सुनाई दे तो इसे ढूँढने की कोशिश ज़रूर करना.

तो इस बार बस इतना ही. दुबारा मिलने पर हम तुम्हें पक्षियों के नामकरण की देशी और वैज्ञानिक पद्धतियों के बारे में बताएँगे.      

00   
copyright reserved