Showing posts with label Hindi blog on birds for children. Show all posts
Showing posts with label Hindi blog on birds for children. Show all posts

Monday, December 14, 2020

***सतरंगी दुनिया में प्रवेश***

बच्चों की एक हिंदी पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!
जितेन्द्र भाटिया

एक : सतरंगी दुनिया में प्रवेश

बर्ड आइलैंड, seychelles के आकाश में सलेटी कुरारियां
sooty terns in the sky at Bird Island, Seychelles 

एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फुदकती गौरैया या आसमान में ऊंचे चक्कर काटती चील को देखकर किसका मन नहीं चाहता कि काश, हम भी इन पखेरुओं की तरह स्वच्छंद आकाश में जहाँ चाहे वहां उड़ सकते! पक्षियों की उड़ान से प्रेरणा लेकर ही इंसान ने कई साल पहले हवाई जहाज़ का आविष्कार किया था. गरुड़ और शाहबाज़ अपने बड़े-बड़े डैनों के सहारे कैसे ज़मीन से उठकर हवा में उड़ जाते हैं. आज भी हमारे विज्ञानं की एक बड़ी शाखा हवाई ज़हाजों के डिजाईन और उनमें इस्तेमाल होने वाली विशेष धातुओं पर काम करती है. लेकिन इतने विकास के बाद भी हमारा विज्ञान जितना जानता है, वह प्रकृति के लाखों वर्ष के विकास के आगे कुछ भी नहीं है. दुनिया का छोटे से छोटा पक्षी भी अपने प्राकृतिक पंखों के सहारे कितनी आसानी से हवा में उड़ सकता है. जबकि हमारे हवाईजहाजों को उड़ने के लिए हवाई पट्टी, कई सारे लोगों और बहुत सारे तामझाम  की ज़रुरत पड़ती है.

पहले हवाई जहाज़ का नक्शा देती कुरजा पक्षियों की उड़ान
Demoiselle Cranes Providing the first Prototypes for Planes

पक्षियों के बारे में जो बात सबसे अधिक रोमांचित और  अचंभे में डालती है, वह है उनका हवा में जहां चाहे वहाँ उड़ सकना। लेकिन हमें पता नहीं होगा कि पंख लगाकर फुर्रसे उड़ जाने वाले पक्षियों का आसमान और उनका संसार कई तरह की चुनौतियों से भरा है। आकाश में, ज़मीन पर या जल में विचरने वाले ये पक्षी अपने पंखों से लंबी दूरियाँ तय कर भोजन तलाशते हैं। अंडे और बच्चे देते हैं और दूसरे मांस-भक्षी पक्षियों या जानवरों से अपनी जान भी बचाते हैं। प्रकृति के विधान में पेड़ों, पक्षियों, जानवरों और इनके साथ साथ इंसान— सबकी अपनी अपनी जगह है। सबका जीवन एक दूसरे के साथ गुंथा हुआ है और जाने अनजाने में सभी एक दूसरे पर निर्भर भी हैं। इनमें से किसी एक के न रहने से प्रकृति का लाखों वर्षों से साधा हुआ संतुलन बिगड़ सकता है। जब हम अकारण एक पेड़ काटते हैं तो इससे सिर्फ जीवन देने वाली हरियाली ही नष्ट नहीं होती। बल्कि इससे उस पेड़ पर घोंसला बनाने वाले पक्षी, गिलहरियाँ और उन पक्षियों का भोजन बनने वाले कीट-पतंगे, सभी बेघर हो जाते हैं। पेड़ों के कटने का प्रभाव आबोहवा पर भी पड़ता है।    


पेड़ों पर बैठे noddy पक्षी
Noddy birds on a tree
पृथ्वी पर इतने सारे पेड़-पौधों और जीवों-पक्षियों का मिल जुलकर एक साथ रहना प्रकृति के लाखों वर्षों के विकास का नतीजा है. यहाँ हर एक के लिए पर्याप्त जगह और सबके लिए अपना-अपना विशिष्ट भोजन मौजूद है. इंसान का भी सदियों से इन सारे पेड़-पौधों, पक्षियों और जीवों से गहरा रिश्ता रहा है और हमारी अधिकांश जरूरतें भी इनसे ही पूरी होती हैं।



वक्र चोंच से फूलों का मधु खींचता शक्करखोरा
little spiderhunter sucking nectar from flowers

प्रकृति के विधान में कई बार एक जीव दूसरे जीव का भोजन भी बनता है। जंगल में बाघ  हरिणों से अपना पेट भरता है, आकाश में गरुड़ छोटे पक्षियों का शिकार करता है और पानी  में बगुला मछलियाँ मारकर खाता है।       

मांस और मछली खाने वाला मनुष्य भी इस नियम का अपवाद नहीं है। प्रकृति में सभी के लिए पर्याप्त जगह और भोजन है।



रात में शिकार करने वाला बगुला
night heron catching fish
दूसरे जीवों की तरह पक्षी भी सदियों से मनुष्य के साथ जीते और रहते आए हैं। वे उसके जीवन का ज़रूरी हिस्सा भी हैं। 

हमारे लिए इन उड़ने वाले साथियों के संसार को समझना और उन्हें पहचानना दिलचस्प होगा। तो आओ, इस शृंखला के जरिये हम इन उड़ने वाले परिंदों के बारे मेँ कुछ नयी बातें जानें और समझें। पक्षियों की यह दुनिया बहुत लुभावनी, चमत्कारी और कभी कभी अचंभे में डालने वाली भी लग सकती है।
हममें से कोई भी, बहुत आसानी से इन पक्षियों का दोस्त बन सकता है। लेकिन बहुत धीरे धीरे, बिना कोई आवाज़ किए, थोड़े से फासले से, ताकि हमारी आहट से ये पक्षी कहीं डर कर उड़ न जाएँ।  


कितने पक्षी?

इस दुनिया में कितने पक्षी होंगे, इसका अंदाज़ लगाना मुश्किल है, लेकिन फिर भी कहा जाता है कि इनकी संख्या हम मनुष्यों से कोई पचास गुना अधिक होगी, यानी कुल साठ अरब या इससे भी अधिक। ये पक्षी दुनिया के हर कोने मेँ हर तरह के मौसम और हर प्रकार की आबोहवा मेँ पाये जाते हैंप्रकृति ने हर पक्षी को अपने मौसम या अपनी आबोहवा मेँ रह सकने और अपने खास ढंग मेँ जीने के लिए उपयुक्त शरीर, पंख, चोंच और पंजे दिए हैं.

प्रकृति ने इन्हें अपनी रक्षा और शत्रुओं से बचने के उपाय भी दिए हैं.

इसी प्राकृतिक कवच के सहारे ये पक्षी हज़ारों साल से हमारे बीच में हैं लेकिन यह भी सच है कि अपने आपको बचा न पाने की इस लड़ाई में कई प्रजातियाँ विलुप्त भी हो गयी. बहुत सारे प्रजातियाँ मनुष्य की पर्यावरण से लड़ाई में भी ख़त्म हो गयी.

जो जातियां अभी हैं, उन्हें बचाने कि ज़िम्मेदारी हम सबकी है. 
उकाब के पंजे मज़बूत होते हैं जिनमें शिकार को पकड़ कर वह उड़ सकता है
eagle has strong talons to lift its prey

यही नहीं, प्रकृति के विकास में हर पक्षी को अपना विशिष्ट भोजन और उड़ने के लिये अलग-अलग ऊँचाइयाँ मिली हैं, ताकि सभी पक्षी आराम  से अपना पेट भर सकें।

पानी में डुबकी लगाने वाली लालसिर बत्तख के पँखों पर पानी नहीं ठहरता



कठफोड़वा अपनी लम्बी चोंच के सहारे सूखी डालियों से कीड़े निकालकर खाता है
woodpecker uses its long beak to pull out insects from the dried bark
 

हमारे समूची दुनिया में पक्षियों की कोई दस हज़ार प्रजातियाँ होंगी. इनमें से कोई 1200 प्रजातियाँ हमारे देश में पायी जाती हैं. हमारे अधिकांश मैदानी इलाकों मेँ पक्षियों की कोई 300 अलग अलग प्रजातियाँ मिल जाएंगी। तुम कहीं भी रहते हो, अपने इर्द गिर्द पक्षियों की कम से कम 100 अलग अलग प्रजातियों को थोड़ी सी कोशिश से ढूंढ ही सकते हो। अगली बार हम अपने पड़ोस के कुछ परिचित और कुछ नए पक्षियों से तुम्हारी पहचान और दोस्ती करवाएँगे।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
--जितेन्द्र भाटिया
copyright/ all rights reserved

Friday, March 17, 2017

(Part 10) कुछ और रिश्तेदार कौओं के! (some more members of the crow family)

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की यह दसवीं कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!
जितेन्द्र भाटिया

कुछ और रिश्तेदार कौए  के ....... 

अब तक तुम कौए परिवार के जिन सदस्यों से मिले उनमें से अधिकाँश काले थे! आओ अब इस परिवार के कुछ अनूठे रंग बिरंगे सम्बन्धियों से मिलते चलें. अलग अलग रंगों के होने के बावजूद इन सब में तुम्हें कौओं के सारे गुण मिल जाएंगे. कौओं की तरह भले ही ये 'कांव-कांव' न करते हों, लेकिन फिर भी इनका स्वर रूखा और कर्कश होता है. और इनमें से कुछ तो अपने गले से कई तरह की अलग अलग आवाजें भी निकाल सकते है. इनमें से अधिकाँश जंगलों के निवासी हैं, लेकिन कुछ को भोजन की तलाश में बस्तियों के नज़दीक भी देखा जा सकता है. ये परिवार हैं तरुपिक (treepies), लंबपूंछिया (magpies) और बनसर्रे (jays). 

तरुपिकों के परिवार का सबसे परिचित सदस्य है लाल तरुपिक (Rufous Treepie) जिसे तुम अक्सर आस पास के बगीचों और वनों में देख सकते हो.  
लाल तरुपिक (Rufous Treepie) (Dendrocitta vagabunda) 
इसकी ख़ास पहचान है इसका दालचीनी तथा सलेटी रंग, लम्बी पूँछ और गले से निकलने वाली अलग अलग आवाजें. कौओं की तरह तरुपिक भी काफी दबंग होता है  और भोजन के लालच में यह अक्सर घरों के आसपास भी आ जाता है, हालाँकि इसका अधिकाँश समय पेड़ों पर ही गुज़रता है. अगर तुम रणथम्भोर या किसी दूसरे अभयारण्य की सैर पर जाओ तो हो सकता है लाल तरुपिक भोजन की तलाश में तुम्हारी जीप तक आ जाए!  
सफ़ारी जीप के भीतर लाल तरुपिक!


सफ़ेद छाती तरुपिक 
पूरी दुनिया में तरुपिक की कुल ग्यारह प्रजातियाँ हैं और इनमें से लगभग आधी हमारे भारतीय जंगलों में पायी जाती हैं. दक्षिणी भारत के जंगलों में लाल तरुपिक से काफी मिलता जुलता सफ़ेद छाती तरुपिक (White Bellied Treepie) (Dendrocitta leucogastra) मिलता है जो चेहरे और पंखों को छोड़कर सफ़ेद होता है. और इसी तरुपिक का एक और भाई पहाड़ों में दिखाई देता है--सलेटी तरुपिक (Grey Treepie) (Dendrocitta formosae) जो सफ़ेद की जगह सलेटी होता है. लेकिन इन अलग अलग रंगों के अलावा  ये सारे तरुपिक अपनी लम्बी पूंछ से लेकर काले चेहरे तक लगभग एक जैसे ही होते हैं! 


लद्दाख में भेड़ की सवारी करती काली चोंच लंबपूंछिया
योरोप के जंगलों और घरों के आसपास कौए से बड़े  आकाrर की एक और काली-सफ़ेद चिड़िया अक्सर कचरे के ढेर के आसपास भोजन तलाशती मिल जायेगी. यह काली चोंच वाली लम्बपूंछिया (Black Billed Magpie) (Pica pica) है जो हमारे पहाड़ों में भी नौ हज़ार फीट से अधिक की ऊंचाई पर अक्सर दिख जायेगी. इसकी आवाज़ भी कौए जैसी ही कर्कश होती है. इसके पंखों पर तुम्हें नीला रंग दिखेगा और देखने में यह कौए से कहीं अधिक सुन्दर होती है. लेकिन इससे भी अधिक सुंदर होती है---
काली चोंच लंबपूंछिया 


कम ऊँचाई वाले पहाड़ों में रहने वाली लाल और पीली चोंच वाली नीली लंबपूंछिया (Red and Yellow Billed Blue Magpies)(Uricissa erythrohyncha) और flavirostris)जो सुबह और शाम के समय अक्सर पहाड़ी आंगनों में भोजन तलाशती और शोर मचाती नज़र आती हैं. 

पीली और लाल चोंच वाली नीली लंबपूंछिया लगभग एक जैसी होती हैं लेकिन इन्हें अलग अलग पक्षी माना गया है.
लाल चोंच वाली नीली लंबपूंछिया का जोड़ा  


लेकिन निस्संदेह नीली लंबपूंछियों के परिवार की सबसे शानदार चिड़िया है श्रीलंका में मिलने वाली श्रीलंका नीली लंबपूंछिया जिसे इस देश के राष्ट्रीय पक्षी होने का गौरव भी हासिल है.  यह श्रीलंका के बाहर कहीं नहीं मिलती.
श्रीलंका नीली लंबपूंछिया (Srilanka Blue Magpie)(Urocissa ornata)
यदि कौए परिवार के इन रंगबिरंगे पक्षियों से तुम्हारा दिल न भरा हो तो तुम्हें मिलाते हैं सुदूर उत्तर पूर्व में पायी जाने वाली हरी लंबपूंछिया (Common Green Magpie)(Cissa chinensis chinensis) जिसका चटक रंग और लिपस्टिक को मात देती लाल चोंच देखते ही बनती है.
हरी लंबपूंछिया 
एशिया के कई देशों में लंबपूंछिया की कई और प्रजातियाँ भी मिलती हैं. इनमें से अधिकाँश काली या काले सफ़ेद रंग की कौए के स्वभाव से मिलती जुलती हैं. 

इनके साथ ही पहाड़ों पर फैले वनों में कौए की ही जाति  के दो बनसर्रे (Jays) भी मिलते हैं. ये स्वभाव में लंबपूंछियों से काफी मिलते जुलते हैं लेकिन इनकी पूंछ उतनी लम्बी नहीं होती. 
यूरेशियन बन्सर्रा (Eurasian Jay)(Garrulus glandarius)
 काला सिर बन्सर्रा (Black Headed Ray)(Garrulus lanceolatus) भी हिमालय की उन्हीं तराइयों में आम देखा जा सकता है, बांज के वनों में शाहबलूत या बांज के फल इसका प्रिय भोजन है. 
काला सिर बन्सर्रा (Black Headed Jay)
हिमालय की तराइयों में तुम्हें ये दोनों बनसर्रे आसानी से मिल जाएंगे.

उम्मीद है कि इन सारी तस्वीरों की कहानी जान चुकने के बाद तुम अब यह तो नहीं कहोगे कि सब कौए काले होते हैं. कौए के इस बड़े परिवार में तुम्हें हर रंग के सदस्य मिल जाएंगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि हज़ारों लाखों साल पहले कौओं के इस परिवार का सूत्रपात किसी एक पक्षी से हुआ होगा और समय के साथ इसके इन सारे वंशजों का विकास धीरे धीरे हुआ होगा. तो पक्षी संसार के सबसे बुद्धिमान परिवार कौए की कहानी हम यहीं समाप्त करते हैं!                                                                                      ***


                                                                             © all rights reserved                                                                                                                                                                                                                                                          


Sunday, February 19, 2017

(Part 9) पूरी बिरादरी कौओं की ...(The Family of Crows)

लद्दाख में दुनिया के सबसे बड़े उत्तरी काले कौओं (Northern Ravens) (Corvus corax)का एक झुण्ड!

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की यह नवीं कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!

जितेन्द्र भाटिया

पूरी बिरादरी कौओं की ....... 

क्या तुम कौओं की 'कांव-कांव' के बगैर जीवन के बारे में सोच भी सकते हो? शायद नहीं !  वे हर जगह हैं. गाँव और शहर में, जंगल या पहाड़ में और जहाँ इंसान नहीं हैं, वहां भी तुम्हें कौओं के झुण्ड मिल जाएंगे. हमारे साथ रहते रहते वे हमारे स्वभाव को भी अच्छी तरह जान गए हैं. कितनी फुर्ती से वे हमारे हाथ की रोटी छीन या चुरा ले जाते हैं. खुले में खाने का सामान देखते ही कैसे वे अक्सर अपने साथियों को बुला लाते हैं. और आकाश में अपने से बड़ा कोई शिकारी पक्षी या बाज़ दिखते ही वे कैसे शोर मचा और भगा भगाकर उसे उड़ा देते हैं! क्या तुम जानते हो कि पक्षियों में कौआ सबसे अधिक बुद्धिमान है? तुमने पानी के बर्तन में कंकड़ डालकर जल के ताल को उठाकर पानी पीने वाले प्यासे कौए की कथा तो ज़रूर सुनी होगी. सूखी रोटी को नर्म बनाने के लिए कौए कई बार उसे पानी में डुबोकर खाते देखे गए हैं. वैज्ञानिकों ने और भी कई परीक्षणों से कौए की समझदारी परखी है और उन्हें पक्षियों में सबसे बुद्धिमान पाया है.
भारतीय जंगली कौआ (Eastern Jungle Crow)(Corvus culminatus)
तो आओ इस बार हम तुम्हें इस चतुर पक्षी के पूरे परिवार और इसके अलग अलग सदस्यों से मिलवायें. वैज्ञानिक शब्दावली में corvidae नाम से जाने वाले कौए के परिवार में एक सौ बीस से अधिक प्रजातियाँ हैं और हमारे आसपास दिखने वाला घरेलू कौआ उनमें से सिर्फ एक है. लेकिन इस परिवार के सभी सदस्यों में तुम्हें कई समानताएं मिलेंगी. लम्बी सीधी चोंच, लम्बे पैर और चोंच के पीछे के हिस्से में रोंयेदार गुच्छा. कौए सभी अच्छे उड़ाकू होते हैं और ये अक्सर कांव कांव के अलावा कई दूसरी आवाजें भी निकालते हैं. ये अक्सर झुंडों में रहते हैं और स्वभाव से ये जिज्ञासु और हर स्थिति में जी सकने वाले होते हैं.   

क्या सभी कौए काले होते हैं? नहीं. हम पहले ही बता चुके हैं कि बहुत से कौए काले-सफ़ेद भी होते हैं. और इस प्रजाति के कई दूसरे सदस्य तो अन्य रंगों के और रंग बिरंगे भी होते हैं. 

कौए पूरी दुनिया में फैले हुए हैं लेकिन seychelles जैसे कुछ द्वीप समूह हैं जहाँ कौए नहीं हैं और इन द्वीपों को अब जानबूझकर कौओं से दूर रक्खा जाता है क्योंकि इनके यहाँ आने से अन्य निवासी पक्षियों का संतुलन बिगड़ सकता है.
रेगिस्तानोंं का बड़ा कौआ (Punjab Raven)(Corax subcorax )




घरेलू कौए के अलावा बड़ी चोंच वाले,काले सफ़ेद और पहाड़ी कौओं (house crow, large billed crow, hooded crow, northern and punjab ravens) के बारे में हम तुम्हें पहले बता चुके हैं (देखिए इसी लेखमाला का भाग 2).


आओ अब इस परिवार के कुछ और  सदस्यों  से  तुम्हें मिलवाते हैं! 

कश्मीर और लद्दाख की सुदूर पहाड़ियों में एक छोटे आकार का कौआ काविन (eurasian jackdaw)(Corvus monedula) मिलता है जिसकी आँखों की पुतली सफ़ेद होती है और जो कौए के कर्कश स्वर की जगह पतली आवाज़ में मिमियाता सा प्रतीत होता है. नीचे दिया काविन का चित्र स्वीडन का है. 
काविन (Eurasian Jackdaw)
मार्जक (carrion crow)
इसी प्रदेश में पहाड़ी कौए से कुछ छोटा 'मार्जक' (carrion crow) (Corvus carone)  भी मिलता है जिसकी चोंच कुछ छोटी होती है. ये दोनों कौए योरोप के ठन्डे प्रदेशों में आम पाए जाते हैं. ठंडी सर्दियों में यहाँ योरोप से एक तीसरा कौआ 'कपटी' (rook)(Corvus frugilegus) भी कभी कभी आता है जिसकी चोंच का पिछला हिस्सा कुछ सफ़ेद होता है.  लेकिन ये सब ठन्डे प्रदेश के कौए हमारे मैदानों में कम ही दिखते हैं. काविन, मार्जक और कपटी, ये तीनों झुंडों में रहते हैं. चमकदार चीज़ों को ये कई बार चुराकर अपने घोंसलों में ले आते हैं.जहाँ लोगों को कई बार अपनी खोई हुई अंगूठियाँ  तक मिली हैं! ये बेहद समझदार होते हैं और दूसरे पक्षियों के अण्डों को तोड़कर खाने के लिए ये अक्सर पत्थरों और लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग करते देखे गए हैं.

कपटी कौआ (Rook)

हवा में उड़ता पील चोंच कर्णभेदी (Alpine Chough)


पहाड़ों की घाटियों में कई बार तुम्हें सीटियों जैसी 'स्विइऊ-स्विइऊ' की तीखी आवाजें  दूर तक सुनाई देंगी. यह कौओं की प्रजाति का एक और सदस्य कर्णभेदी (chough) है! इन घाटियों में एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी तक इसकी सीटियाँ और कलाबाज़ उड़ानें देखते ही बनती हैं. इसकी दो प्रजातियाँ हिमालय और दूसरे पहाड़ों में मिलती हैं-- लाल चोंच कर्णभेदी (red billed chough)(Pyrrhocorax pyrrhocorax) और पील चोंच कर्णभेदी (yellow billed or alpine chough)( Pyrrhocorax graculus).
पील चोंच कर्णभेदी (Alpine Chough)
 जैसा कि इनके नामों से ज़ाहिर है, इनमें से एक की चोंच लाल और दूसरे की पीली होती है. लेकिन पैर दोनों के लाल होते हैं. ये पक्षी जोड़ों में रहते हैं और पहाड़ों की सीधी चट्टानों पर अपना घोंसला बनाते हैं. 
चट्टानों के बीच लाल चोंच कर्णभेदी का घोंसला 
हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में कौओं की प्रजाति का एक और अनोखा पक्षी मिलता है--चितली अखरोटफोड़ा (spotted nutcracker) जिसका मुख्य भोजन है देवदार वृक्ष के बीज. इसके अलावा यह कीड़े भी खाता है. इसकी नुकीली चोंच देवदार की तहों से बीज निकालने और उन्हें तोड़ने के काम आती है. 
चितला अखरोटफोड़ा (spotted nutcracker)
अखरोटफोड़ा सर्दियों के लिए एक बार में तीस हज़ार या इससे भी अधिक देवदार के बीज बचाकर रखता है. अपने इस काम से यह पर्यावरण की रक्षा भी करता है. कहा जाता है कि जंगलों की आग और मनुष्य द्वारा नष्ट किये देवदार के हज़ारों पेड़ इस पक्षी द्वारा इकट्ठे किये बीजों से दुबारा उग आते हैं! 
कौओं की बिरादरी यहीं समाप्त नहीं होती! अगली बार तुम्हारा परिचय इस परिवार के कुछ अन्य रंगीन सदस्यों से होगा! 
***


© all rights reserved

Thursday, September 22, 2016

(भाग 8) प्रवासी पक्षियों की कुछ और कहानियां....


हिंदी की एक विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक धारावाहिक blog करता हूँ. उसी की यह ताज़ा आठवीं कड़ी !

जितेन्द्र भाटिया
प्रवासी पक्षियों की कुछ और कहानियाँ.... 

यह तो हम तुम्हें बता ही चुके हैं कि भोजन और आबोहवा के लिए बहुत सारे पक्षी हर साल लम्बी यात्राएं करते हैं. अक्सर इन यात्राओं में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है और कई बार तो उनकी जान पर ही बन आती है. तो इस बार तुम्हें सुनाते हैं पक्षियों की यात्राओं से जुड़ी कुछ दिल छू लेने वाली कहानियां! 

गुजरात में कच्छ का एक प्रमुख शहर है भुज! इस शहर के बीचोंबीच एक 450 पुरानी झील है हरमिरसर. सर्दियाँ आते ही यह झील दूर दूर से आये प्रवासी पक्षियों से भर जाती है. कई तरह की बत्तखें, कुरारियां, पनकौवे, छोटे गुदेरे, बगुले और इन सभी के साथ बड़े-बड़े सफ़ेद हवासिल great white pelicans (pelacanus oncrotalus), शान से झील के एक छोर से दूसरे छोरे  तक फुर्सत में धीरे-धीरे तैरते हुए.

हरमिरसर झील में पक्षियों का झुण्ड 

सर्दियों के ख़त्म होते ही ये सारे पक्षी एक-एक कर वापस योरोप, मंगोलिया या साइबेरिया लौट जाएंगे. हवासील हमेशा एक झुण्ड में तैरते हैं. अपनी तीन दिनों की यात्रा में हम जितनी बार उस झील पर गए, हमने देखा कि झील के बीचोंबीच तैर रहे हवासिलों के बड़े से झुण्ड से अलग तीन हवासिल हमेशा किनारे के पास तैरते मिलते हैं. ध्यान से देखने पर पता चला कि उनमें से एक हवासिल चोटिल है. 

चोटिल हवासिल अपने पंख सूखाता हुआ 

हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि किसी अजनबी के पास आते ही वे झट किनारे से दूर चले जाते हैं लेकिन किनारे पर कपड़े धो रही औरतों से ये ज़रा भी नहीं डरते. हमारे पूछे जाने पर एक औरत ने बताया कि तीन साल पहले एक कुत्ते ने पानी में घुसकर इस हवासिल का पंख तोड़ डाला था. जब मार्च में इनके वापस लौटने का समय आया तो घायल हवासिल ने पंख  फड़फड़ाकर पाया कि वह उड़ नहीं सकता. झुण्ड के सारे हवासिल एक एक कर उड़ गए. लेकिन ये दो हवासिल संकट में अपने चोटिल दोस्त का साथ छोड़ने की जगह उसके साथ यहीं रुक गए. तबसे ये तीनों हवासिल बारहों महीने यहीं साथ साथ रहते हैं. और अब तो ये हमें पहचानने भी लगे हैं. दोस्ती की खातिर अपनी जन्मस्थली छोड़ने वाले ये तीनों सच्चे मित्र हरमिरसर झील में  आज भी आपको साथ-साथ तैरते मिल जायेंगे. 

चोटिल हवासिल और उसके दोनों दोस्त 

 हिन्द महासागर में  टापुओं का एक खूबसूरत द्वीप समूह है सेशेल्स जो अपने सुन्दर समुद्र तटों के लिए विख्यात है. यहीं एक छोटा सा पक्षी द्वीप (Bird Island) है जहां हर साल लाखों की संख्या में पक्षी प्रजनन के लिए आते हैं और बच्चे बड़े होने के बाद यहाँ से उड़ जाते हैं.

पक्षी द्वीप seychelles

 इस द्वीप पर सांप, चूहे और खरगोश नहीं हैं, जिसके कारण पक्षी अपने अण्डों की चिंता किये बगैर जमीन पर भी घोंसले बना सकते हैं. इस द्वीप पर प्रजनन के लिए आने वाले पक्षियों  में सबसे प्रमुख--सलेटी कुकरियाँ (Sooty Terns) (Onychoprion fuscata) हर साल पांच से छः लाख की संख्या में घोंसले बनाने यहाँ आती हैं.

पक्षी द्वीप पर सलेटी कुकरियों के घोंसले 

 वैज्ञानिकों ने पाँव में छल्ले लगाकर पहचान की है कि वही पक्षी कोई चार साल बाद यहाँ लौटते हैं. बीच के चार साल ये पक्षी समुद्र पर उड़ते हुए गुजारते हैं.  

हवा में उड़ती सलेटी कुकरियाँ

मज़े की बात यह है कि सलेटी कुकरी को पानी मैं तैरना नहीं आता लेकिन फिर भी इसका अधिकाँश समय समुद्र पर उड़ते हुए बीतता है. समुद्र पर उड़ते उड़ते ही यह गोते लगाकर मछलियाँ पकड़ती है और कई बार उड़ते उड़ते ही हवा में अपनी नींद भी पूरी कर लेती है.

जिस तरह मनुष्यों में दूसरों का सामन छीनने वाले डाकू होते हैं, उसे तरह पक्षियों में भी समुद्री डाकू होते हैं! 

पेड़ों पर बैठे डाकू जहाजी पक्षी 

पक्षी द्वीप पर विशालकाय डैनों वाला जहाजी पक्षी great frigate bird (Fregata minor) कुछ इसी तरह के समुद्री लुटेरे का सा काम करता है. कुकरियाँ जब समुद्र से मुंह में घोंसले के बच्चों के लिए लौट रही होती हैं तो ये लुटेरे पक्षी उनके पीछे पड़कर उन्हें इतना थका देते हैं कि वे चोंच में पकड़ी मछली को छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं. और तब ये पक्षी उस छोड़ी हुई मछली को हवा में ही पकड़कर अपना भोजन बना लेते हैं!  

लम्बी यात्रा पर निकले प्रवासी पक्षियों को यूं तो रास्ते में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. लेकिन इन यात्राओं पर पक्षियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है मनुष्य! हर वर्ष यात्रा पर निकले लाखों पक्षियों में से बहुत सारे रास्ते में इंसान की बंदूकों के निशाने से मारे जाते हैं. यह खतरा प्रवास में कम ऊँचाई पर उड़ने वाले पक्षियों के लिए सबसे अधिक होता है.

अमूर शाहीन 

ऐसा ही एक पक्षी है बाज़ प्रजाति का अमूर श्यान या शाहीन amur falcon (Falco amurensis) जो बहुत कम ऊँचाई पर उड़ता हुआ अपनी प्रवास यात्रा में भारत से होकर गुज़रता है, और कई बार उसकी यह कम ऊँचाई की यात्रा ही उसकी मौत का कारण बन जाती है. हर साल हज़ारों अमूर के झुण्ड अपने जन्मस्थल साइबेरिया से उड़कर दक्षिणी अफ्रीका की 22000 किलोमीटर की लम्बी यात्रा तय करते हैं. इंसान को कुछ वर्ष पहले ही सॅटॅलाइट की मदद से उनके हवाई मार्ग का पता चला जिसमें वे उत्तर पूर्व भारत के ऊपर से होते हुए अफ्रीका पहुँचते हैं. 

नागालैंड में पकड़े निरीह अमूर शाहीन 

उनके लिए इस यात्रा का सबसे मारक हिस्सा था नागालैंड, जहाँ अभी कुछ समय पहले तक 120 हज़ार या इससे भी अधिक अमूर हर साल अपने मांस के लिए बेरहमी से मार दिए जाते थे. एक समय तो ऐसा लगा कि बड़े पैमाने पर इन नृशंस हत्याओं के कारण धरती से इस सुन्दर पक्षी का नामोनिशान ही मिट जाएगा. तब बहुत सारी संस्थाओं के साथ नागालैंड सरकार और चर्च ने मिलकर  अमूर शाहीन को बचाने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया जो आज भी चल रहा है. 

मच्छरदानी में बंद किये अमूर, मारे जाने से पहले  

इस पक्षी को बचाने का महत्त्व बच्चों को समझाना सबसे आसन था. फिर उनके द्वारा उनके परिवार वालों को भी जागरूक किया गया. संस्थाओं ने इसके लिए आकर्षक पोस्टर के ज़रिये सन्देश भी दिया कि यह पक्षी हमारे देश का मेहमान है और इसे बचाना हम सबका फ़र्ज़ है. शिकार करने वालों को कानून से भी डराया गया.

नागालैंड के मुख्यमंत्री 'अमूर बचाओ अभियान' से जुड़े बच्चों के साथ   

 नागालैंड में सबसे अधिक लोग बैप्टिस्ट क्रिश्चियन  धर्म को मानते हैं. वहां की चर्च ने जब इस अभियान को समर्थन देते हुए सन्देश दिया कि बाइबिल में भी शाहीन जैसे जीवभक्षी पक्षियों को खाने की मनाही है तो पुराने ख्यालों वाले लोग भी मान गए.  इस सारे अभियान का अच्छा परिणाम यह निकला है कि पिछले दो तीन वर्षों में नागालैंड में अमूर शाहीन का शिकार काफी कम हो गया है. यह प्रयास यदि आगे चलकर पूरी तरह सफल हो गया तो अमूर शाहीन सचमुच नागालैंड का शुक्रगुजार होगे. 

'अमूर बचाओ अभियान' का एक पोस्टर 

(हम  Conservation India और Ramki Srinivasan के आभारी हैं जिन्होंने इस कड़ी के लिए अमूर शाहीन और उसके शिकार से जुड़े कुछ चित्र भेजे).


***

© all rights reserved 

Sunday, July 24, 2016

(Part 7) पंछी ऐसे आते हैं....(Some More Stories of Migration of Birds)

खीचन  में कुरजा पक्षियों का समूह 

बच्चों की एक हिंदी विज्ञान पत्रिका के लिए मैं पक्षियों पर एक श्रृंखला कर रहा हूँ. मित्रों और बहुत से बच्चों का आग्रह था कि इसे 'ब्लॉग' का रूप भी दिया जाए. इसी की पूर्ति में प्रस्तुत है पक्षियों की अनोखी दुनिया की यह सातवीं कड़ी जो शायद बच्चों के अलावा बड़ों को भी पसंद आये!

जितेन्द्र भाटिया
पंछी ऐसे आते हैं....... पंछी ऐसे जाते हैं...... 

यह तो हम तुम्हें बता ही चुके हैं कि भोजन और प्रजनन के लिए बहुत सारे पक्षी हर साल लम्बी यात्राएं करते हैं. लेकिन लम्बी दूरियों तक का प्रवास करने वाले कुछ पक्षियों के कारनामे सुनकर तुम आश्चर्य में पड़ जाओगे !


राजस्थान में जोधपुर से कुछ दूरी पर फलौदी शहर के पास एक छोटा सा गांव  है खीचन, जो तपती गर्मियों में लगभग उजाड़ हो जाता है. लेकिन बरसातों के बाद सितम्बर का अंत होते-होते यहाँ हज़ारों की संख्या में सुदूर मंगोलिया से कुरजाएं (demoiselle cranes) उड़कर आनी शुरू हो जाती हैं.


उड़कर आती कुरजाएं (demoiselle  cranes)(Grus virgo)   


फिर ये लगभग छह महीनों तक यहीं रहती हैं और गाँव वाले बहुत प्यार के साथ इन सारे पक्षियों के लिए भोजन का इंतज़ाम करते हैं. हर शाम लगभग एक टन ज्वार चुग्गाघर के मैदान में इन पक्षियों के लिए फैलाया जाता है. 


सुबह के समय चुग्गाघर में कुरजाएं 

,दुनिया भर से यहां सैलानी इन सुन्दर पक्षियों को देखने के लिए आते हैं, जिनकी संख्या सितम्बर के अंत तक दस हज़ार से भी अधिक हो जाती है.  गाँव वाले बहुत जतन से छह महीनों तक इन पक्षियों की देखभाल करते हैं. फिर मार्च के अंत तक ये पक्षी फिर से उड़कर अपने सुदूर देश मंगोलिया में लौट जाते हैं. 

खीचन में उड़कर आती कुरजाएं 

मज़े की बात यह है कि कुरजा पक्षी अपने अंडे और बच्चे  सुदूर देश मंगोलिया में ही देता है. 

तुम पूछ सकते हो कि इतने सफर में भी ये पक्षी कभी भटकते नहीं? इतनी दूर से वे नियत समय पर हर साल गाँव कैसे पहुँच जाते हैं?  और यह लंबा सफर वे एक बार में ही पूरा करते हैं या रास्ते में कहीं रुकते भी हैं? और इस यात्रा में क्या बच्चे भी उनके साथ होते हैं? रास्ते में इन्हें भोजन कैसे मिलता है? और रास्ते में क्या इन्हें खतरों का भी सामना करना पड़ता है? पक्षियों के लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़े ये सवाल हमें ही नहीं, दुनिया भर के वैज्ञानिकों को भी अचम्भे में डालते रहे हैं. और इनमें से कुछ के जवाब तो उन्हें पक्के तौर पर आज भी मालूम नहीं हैं.

छोटे पक्षी के पैर  में छल्ला लगाता वैज्ञानिक (चित्र  सौजन्य Julio Reis)  


यूं तो पक्षियों के इस प्रवास या पव्रजन (migration) की जानकारी  मनुष्य को बहुत पहले से है.  लेकिन उड़ने के बाद पक्षी किस रास्ते से कहाँ जाते हैं, यह पता लगाना मुश्किल था. फिर कुछ  वैज्ञानिकों ने पहचान के लिए पक्षियों के पैरों में छल्ला बांधकर उनकी पहचान करने और उनकी यात्राओं के रास्तों के बारे में पता लगाने की कोशिश की. आधुनिक समय में उपग्रह या satellite के ज़रिये पक्षियों के आकाश पथों का पता लगाना बहुत आसान हो गया है. जैसे अब पता चला है कि कुरजाएं पूर्व से ही नहीं, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते भी हमारे देश में आती हैं. बाज़ (falcon ) जाति के कई पक्षी मंगोलिया/ चीन से थाईलैंड और फिर हमारे उत्तर पूर्वी राज्यों (नगालैंड, असम) से होते हुए हमारे देश से गुज़रकर आगे अफ्रीका चले जाते हैं. कई उकाब सीधे हिमालय पार कर भी हमारे देश में आते हैं. 

लालसिर बत्तख का जोड़ा  red crested pochard (Netta rufina)- यह दक्षिण योरोप से पाकिस्तान के रास्ते सर्दियाँ बिताने हमारे यहां आती है. यह चित्र दार्जीलिंग के पास की एक झील का है.  


पव्रजन के दौरान पक्षी अलग अलग ऊंचाइयों पर उड़कर अपना सफर तय करते हैं. एवेरेस्ट के एक अभियान में चोटी पर छोटे गुदेरे (Bar Tailed Godwit) और सींखपर बत्तख (Northern Pintail) की अस्थियाँ मिली, यानी ये पक्षी वहां 5000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे थे.  

सींखपर बत्तख (Anas acuta) का जोड़ा दक्षिणी भारत में   


सरपट्टी सवन (Bar Headed Goose) हिमालय पार करते समय इससे भी अधिक 6500 मीटर  की  ऊंचाई पर उड़ती है. लेकिन अधिकाँश पक्षी प्रवास की यात्राओं में काफी नीचे 150 से 500 मीटर तक की ऊंचाइयों पर उड़ान भरते हैं. बाज़ और उक़ाब अक्सर अपने काफिलों में गोल गोल उड़ते हुए आगे बढ़ते हैं. अपनी यात्रा को आसान बनाने के लिए पक्षी अक्सर पहाड़ों के बीच, नदियों के ऊपर से या समुद्रतट के किनारे आकाश मार्ग बनाते हैं ताकि उन्हें अनुकूल हवा से मदद मिल सके.

पव्रजन यात्रा करने वाले अधिकाँश पक्षी एक ही आकाश मार्ग का इस्तेमाल करते हैं जहाँ एक के बाद एक, अलग अलग पक्षियों के काफिले आकाश से गुज़रते हैं. 

प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ जॉर्ज मोंटागु के नाम से जाने वाला मोंटागु गिरगिटमार  Montagu Harrier (Circus pygargus)  योरोप से आकर यहां सर्दियां बिताता है 

इस नज़ारे को देखने के लिए वैज्ञानिक और पक्षी प्रेमी अक्सर अपनी दूरबीनें और कैमरे लेकर पहुँचते हैं. 

रैप्टर हिल थाईलैंड में उकाब की प्रतिमा 


तुर्की के पास बोस्फोरस की खाड़ी, स्वीडन के दक्षिण में स्थित फॉलस्टर्बो और थाईलैंड में रैप्टर हिल ऐसे ही कुछ जाने-माने स्थल हैं जहां से हर साल लाखों की संख्या में पक्षी आकाश के रास्ते गुज़रते हैं. अक्सर यहां वैज्ञानिक पहचान के लिए कुछ पक्षियों के पैरों में इलेक्ट्रॉनिक छल्ले बांधकर इन्हें फिर से आकाश में छोड़ देते हैं ताकि इंसान को पक्षियों की इन हवाई यात्राओं को समझने में मदद मिल सके.

तुमने कई बार देखा होगा कि हवा में उड़ते पक्षियों के समूह कई बार अंग्रेजी के V अक्षर बनाकर उड़ते नज़र आते हैं. ऐसा वे हवा को काटकर ऊर्जा बचाने के लिए करते हैं. वैज्ञानिकों ने पाया है कि V के आकार में उड़ती बत्तखें किसी अकेली बत्तख के मुकाबले दस से बीस प्रतिशत ऊर्जा बचाकर लगभग 5 किलोमीटर प्रति घंटा अधिक तेज़ उड़ पाती है. 

सर्दियों में तालाबों/नदियों पर अक्सर दिखाई देने वाला जीरा बाटन little ring plover (Charadrius dubius) जिसकी आँखों का पीला घेरा प्रजननशील नर की निशानी है. यह अपना घोंसला योरोप में बनता है 

प्रजनन के बाद जब बच्चे बड़े होकर पूरी तरह उड़ान भरने लगते हैं तो इन्हें भी इन लम्बी यात्राओं में शामिल कर लिया जाता है. लेकिन देखा गया है कि उड़ते पक्षियों के अधिकाँश समूहों में बच्चे सबसे आगे उड़ते हैं, ताकि वे लगातार बड़ों की निगाहों में बने रहें! 

आकाशमार्ग का यह लंबा सफर कुछ पक्षी तो एक बार में ही पूरा कर लेते हैं तो कुछ रुक रूक कर कई दिनों या कुछ सप्ताहों में  यह रास्ता तय करते हैं. 

बिना रुके एक बार में सबसे लंबी उड़ान भरने का विश्व रिकॉर्ड छोटे गुदरा के नाम है. यह पक्षी अलास्का से उड़कर न्यूज़ीलैंड के अपने प्रजनन स्थलों तक का 11000 किलोमीटर का सफर एक बार में पूरा कर डालता है. कहा जाता है कि इस लम्बी उड़ान के दौरान उसके शरीर का वजन आधे से भी काम रह जाता है.

दुनिया के सबसे लम्बे उड़ाकू पक्षी का बड़ा भाई बड़ा गुदेरा black tailed godwit (Limosa limosa)    

 इससे भी आश्चर्य उड़ान आर्कटिक कुकरी (arctic  tern) की है जो आर्कटिक के अपने प्रजनन स्थलों से पृथ्वी  के दूसरे छोर अंटार्कटिका तक का लम्बा सफर हर साल तय करती है. कुछ वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में पहचान के लिए  कुछ कुकरियों के पैरों में छल्ले बांधे और फिर दो तीन दिन हवाई जहाज़ों में बैठकर आर्कटिक आए. उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने पाया कि  वे पक्षी उनसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे!

लेकिन कम ऊंचाई पर उड़ने वाले अधिकाँश पक्षी  सीधे सफर करने की जगह बीच बीच में रूककर विश्राम करते और भोजन तलाशते हैं. कई बार यह विश्राम उनके लिए खतरे का कारण भी बन जाता है. पव्रजन के दौरान पक्षियों पर आने वाली विपदाओं  की कुछ और कहानियां अगली बार!

***

© all rights reserved